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मैहर जिले जंगल का रक्तपात और विभागों की कब्रगाह-सी चुप्पी

 



मैहर जिले का भटूरा क्षेत्र इन दिनों किसी विकास-यज्ञ का नहीं, बल्कि जंगल के सीने पर चल रहे बुलडोज़र-तांडव का प्रतीक बन चुका है। हरियाली की कोख चीरकर पत्थर उगाए जा रहे हैं, नियम-कायदों को ऐसे रौंदा जा रहा है जैसे वे काग़ज़ नहीं, सूखे पत्ते हों। जिन स्थानों पर न खदान स्वीकृत है, न खनन माइनिंग प्लान में नाम दर्ज—वहीं खुलेआम विस्फोट, खुदाई और लूट का महोत्सव जारी है। भटूरा में दा मैहर स्टोन एंड लाइम कंपनी प्राइवेट लिमिटेड और के के गौतम लाइम स्टोन कंपनी का नाम आजकल चर्चाओं की आग में तप रहा है। जंगल से सटी सीमाओं के पास खदानें ऐसे खोदी जा रही हैं मानो वन क्षेत्र कोई अनाथ ज़मीन हो, जिसकी रक्षा करने वाला कोई नहीं। और सच भी यही दिखता है—वन विभाग की रहस्यमयी चुप्पी सवाल नहीं, आरोप बनकर खड़ी है।

चर्चा है कि मैहर जिले का खनिज विभाग खनन माफिया के मैनेजमेंट पर चलता है, और वन विभाग चेहरा देखकर कार्रवाई करता है। नियमों की किताबें अलमारी में सड़ रही हैं, जबकि जंगल ज़मीन पर मर रहा है।यह कोई पहली चेतावनी नहीं थी। पूर्व में भटूरा स्थित जैन कंपनी की खदान में एक नाबालिग श्रमिक की मौत—एक आदिवासी बच्चे का खून—पूरे तंत्र के मुँह पर तमाचा था। मगर जवाब में मिला क्या? सन्नाटा। बताया गया कि नाबालिग से श्रम कराने का मामला है, पर आज तक खदान संचालक पर न तो ठोस कार्रवाई, न गैर-इरादतन हत्या जैसी धाराएँ। सवाल उठता है—क्या कानून भी ठेके पर दे दिया गया है? भटूरा में माफियाओं का काला साम्राज्य इतना फैला है कि जिले के जिम्मेदार विभाग मानो उसी की परछाईं में सांस लेते हों। खनिज, वन, श्रम और पर्यावरण—चारों विभागों ने जैसे सामूहिक मौन-व्रत ले रखा है- हम कार्रवाई नहीं करेंगे—चाहे नियम-कायदे कार्यालय की चौखट में गाड़ने पड़ें।नाबालिग आदिवासी की मौत के बाद प्रशासन का व्यवहार और निष्क्रियता यह साबित करने के लिए काफी है कि काग़ज़ों में फरिश्ते, ज़मीन पर मूकदर्शक—यही आज की हकीकत है। देश-सेवा और जन-सेवा की शपथें भाषणों में रह गईं! ज़मीनी सच यह है कि विभाग माफियाओं के इशारों पर नाचते कठपुतली बन चुके हैं। अगर उठ रही चर्चाएँ झूठी हैं, तो चुनौती साफ़ है—सभी संबंधित विभाग प्रेस विज्ञप्ति जारी कर भटूरा में संचालित खदानों को नियमसम्मत घोषित करें। खदानों की स्वीकृतियाँ, माइनिंग प्लान, पर्यावरणीय मंज़ूरियाँ, श्रम अनुपालन—सब कुछ सार्वजनिक करें।और यदि ऐसा नहीं होता, तो यह मान लिया जाएगा कि दायित्व से भटके विभाग खनन माफियाओं की जी-हजूरी में लिप्त हैं।जंगल का सीना छलनी है, कानून की आवाज़ दबाई जा रही है, और एक बच्चे की मौत फ़ाइलों में दफन है। यह विकास नहीं—यह राज्य की आत्मा पर चल रहा अवैध खनन का खूनी तांडव है।


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